निम्नलिखित
प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर लिखिए :
a) Discuss the major challenges facing India's food processing industry. What initiatives have been taken by government for the improvement? [8] भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। सुधार के लिए सरकार द्वारा क्या पहल की गई हैं?
उत्तर- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश
है, किंतु खाद्य
प्रसंस्करण का स्तर अभी भी लगभग 10% है, जबकि विकसित देशों में यह 60-80% तक है। परिणामस्वरूप भारी मात्रा में कृषि
उत्पाद कटाई के बाद नष्ट हो जाते हैं। अतः खाद्य प्रसंस्करण उद्योग किसानों की आय, रोजगार, निर्यात तथा मूल्य
संवर्धन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
प्रमुख
चुनौतियाँ
- अवसंरचना की कमी- कोल्ड चेन, वेयरहाउस, रेफ्रिजरेटेड परिवहन तथा आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों के अभाव से फल-सब्जियों में 25-30% तक पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान होता है।
- वित्तीय एवं तकनीकी बाधाएँ- लगभग 90% इकाइयाँ असंगठित क्षेत्र में हैं, जिन्हें सस्ती पूँजी, आधुनिक तकनीक तथा अनुसंधान सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं।
- कमजोर आपूर्ति श्रृंखला- “मूल्य श्रृंखला में समन्वय की कमी, बिचौलियों की अधिकता तथा किसानों को कम मूल्य प्राप्त होना।
- नियामकीय कठिनाइयाँ- सरकार के मानकों, बहु-लाइसेंस व्यवस्था तथा वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन में कठिनाई निर्यात प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है।
सुधार
हेतु सरकार की पहलें
- मेगा फूड पार्क एवं कोल्ड चेन अवसंरचना हेतु प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना।
- सूक्ष्म खाद्य उद्यमों को सब्सिडी तथा “एक जिला-एक उत्पाद” दृष्टिकोण हेतु पीएम-एफएमई योजना।
- निजी निवेश एवं निर्यात वृद्धि हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना।
- आपूर्ति श्रृंखला और भंडारण क्षमता सुदृढ़ करने हेतु ऑपरेशन ग्रीन्स एवं कृषि अवसंरचना निधि।
- बिहार सरकार की बिहार खाद्य प्रसंस्करण नीति (2024-25), हर पंचायत में फूड प्रोसेसिंग यूनिट, PMFME योजना में बिहार का शीर्ष प्रदर्शन आदि।
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भारतीय कृषि को “उत्पादन
आधारित” से “मूल्य संवर्धन आधारित” अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर सकता है। बेहतर
अवसंरचना, तकनीक और बाजार
सुधारों से यह क्षेत्र किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार तथा वैश्विक खाद्य निर्यात में भारत की भागीदारी बढ़ाने का
प्रमुख आधार बन सकता है।
b) Jute is in great demand because of cheapness softness,
strength length and uniformity of its fibre. Explain its favourable conditions
suitable for the Jute cultivation in West Bengal and Bihar. [8]
जूट की सस्ती क़ीमत, कोमलता,
मजबूती, लंबाई और रेशों की एकरूपता के कारण
इसकी अत्यधिक मांग है। पश्चिम बंगाल और बिहार में जूट की खेती के लिए उपयुक्त
अनुकूल परिस्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
जूट को “गोल्डन फाइबर” कहा जाता है। इसकी सस्ती कीमत, कोमलता,
मजबूती, लंबाई तथा रेशों की एकरूपता के कारण
पैकेजिंग, वस्त्र, कालीन एवं भू-वस्त्र
उद्योगों में इसकी अत्यधिक मांग है। भारत विश्व के लगभग 60% जूट का उत्पादन करता
है जिसमें पश्चिम बंगाल और बिहार प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
जूट की खेती के लिए
अनुकूल परिस्थितियाँ
उष्ण एवं आर्द्र जलवायु
जूट
के लिए 25°–35°C
तापमान, 150–200 सेमी वर्षा तथा 80% से अधिक
आर्द्रता उपयुक्त है।
पश्चिम
बंगाल में बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी आर्द्रता, बिहार
के उत्तर-पूर्वी मैदानों में नम जलवायु जूट की वृद्धि के लिए आदर्श परिस्थितियाँ
हैं।
उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी
गंगा-ब्रह्मपुत्र
डेल्टा तथा उत्तर बिहार के कोसी-गंडक मैदान नवीन जलोढ़ मिट्टी से बने हैं जो जैव
पदार्थ एवं नाइट्रोजन से समृद्ध होती है। इससे लंबे एवं मजबूत रेशों का विकास होता
है।
प्रचुर जल उपलब्धता
जूट
में रेशा अलग करने हेतु पर्याप्त जल की आवश्यक की पूर्ति गंगा, हुगली,
कोसी, गंडक और महानंदा जैसी नदियों के द्वारा
होती है।
श्रम एवं औद्योगिक आधार
जूट
श्रम-प्रधान फसल है। दोनों राज्यों में सस्ता श्रम उपलब्ध है। पश्चिम बंगाल में
हुगली तट पर जूट मिलों का संकेंद्रण तथा कोलकाता बंदरगाह निर्यात को बढ़ावा देती
है।
निष्कर्षत:
अनुकूल जलवायु,
उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, प्रचुर जल तथा औद्योगिक
अवसंरचना ने पश्चिम बंगाल और बिहार को भारत का प्रमुख “जूट क्षेत्र” बना दिया है।
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c) Describe the role of natural resource management, inclusive
development and e-technology for achieving the goal of a Atmanirbhar Bharat and
Viksit Bharat. [8]
आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, समावेशी विकास और-ई-प्रौद्योगिकी की भूमिका का
वर्णन कीजिए।
उत्तर-
आत्मनिर्भर भारत तथा विकसित भारत–2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं
है, बल्कि सतत, समावेशी एवं तकनीक-संचालित विकास मॉडल की
स्थापना से जुड़ा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन,
समावेशी विकास और ई-प्रौद्योगिकी की केंद्रीय भूमिका है।
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
- कृषि, ऊर्जा
एवं उद्योग प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होने से उनका सतत प्रबंधन आवश्यक है।
- जल
संरक्षण,
सूक्ष्म सिंचाई एवं वाटरशेड प्रबंधन कृषि उत्पादकता बढ़ाते हैं।
- सौर, पवन
एवं हरित हाइड्रोजन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से आयात निर्भरता में कमी आ रही है।
- वन एवं जैव विविधता संरक्षण से जनजातीय आजीविका और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूती।
समावेशी विकास
- विकसित भारत तभी संभव है जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
- स्वयं
सहायता समूह,
स्किल इंडिया एवं DBT जैसी पहलें महिलाओं,
किसानों और MSMEs को सशक्त बना रही हैं।
- वित्तीय
समावेशन,
स्वास्थ्य एवं शिक्षा तक पहुँच से सामाजिक असमानता में कमी।
- जनसांख्यिकीय लाभांश को उत्पादक मानव पूंजी में बदलने के प्रयास।
ई-प्रौद्योगिकी
- डिजिटल
इंडिया,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स,
ड्रोन, UPI आदि द्वारा
शासन और अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन।
- तकनीक
आधारित कृषि से जल एवं उर्वरक दक्षता, उत्पादन में वृद्धि।
- e-Governance से पारदर्शिता एवं सेवा वितरण में सुधार आया।
- डिजिटल भुगतान एवं स्टार्टअप इकोसिस्टम से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वृद्धि।
इस
प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग, समावेशी विकास तथा
ई-प्रौद्योगिकी का समन्वय ही आत्मनिर्भर भारत को विकसित भारत–2047 में परिवर्तित
करने का आधार बनेगा।
d) Give an account of the environmental and social benefits of
geothermal energy in India with suitable examples. [7]
उपयुक्त उदाहरणों सहित भारत में भूतापीय ऊर्जा के पर्यावरणीय और
सामाजिक लाभों का विवरण दीजिए।
उत्तर-
भूतापीय ऊर्जा (Geothermal
Energy) पृथ्वी के आंतरिक भाग में निहित ऊष्मा से प्राप्त होने वाली
स्वच्छ, नवीकरणीय एवं बेस-लोड ऊर्जा है, जो मौसम या दिन-रात के चक्र पर निर्भर नहीं होती। भारत में लगभग
10,000–10,600 मेगावाट भूतापीय ऊर्जा क्षमता आँकी गई है, जिसका
प्रमुख भंडार लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़,
झारखंड और अरुणाचल प्रदेश में स्थित है।
पर्यावरणीय लाभ
- न्यून कार्बन उत्सर्जन-अत्यंत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने से ऊर्जा के साथ नेट-ज़ीरो 2070 लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक।
- निरंतर स्वच्छ ऊर्जा- सूर्य एवं वायु की तुलना में निरंतर विद्युत उपलब्धता से ऊर्जा मिश्रण अधिक स्थिर बनता है। पुगा घाटी (लद्दाख) तथा मणिकरण (हिमाचल प्रदेश) में भूतापीय संसाधनों का उपयोग स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएँ प्रदर्शित करता है।
- कम भूमि एवं जल उपयोग- भूतापीय संयंत्र अपेक्षाकृत कम भूमि घेरते हैं तथा जल आवश्यकता भी सीमित होती है।
- वायु प्रदूषण में कमी- हानिकारण गैसों, कणीय
प्रदूषकों का उत्सर्जन नगण्य होने से सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को लाभ।
सामाजिक
लाभ
- समावेशी विकास- लद्दाख एवं अरुणाचल जैसे दुर्गम क्षेत्रों में विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध कराकर क्षेत्रीय असमानताओं में कमी।
- रोज़गार- ऊर्जा, पर्यटन, ग्रीनहाउस कृषि तथा खाद्य प्रसंस्करण में नए अवसर।
- कृषि एवं आजीविका- ठंडे क्षेत्रों में ग्रीनहाउस खेती तथा खाद्य संरक्षण को बढ़ावा।
- स्वास्थ्य लाभ- स्वच्छ ऊर्जा होने से वायु प्रदूषणजनित रोगों में कमी।
- दिरांग (अरुणाचल प्रदेश) में भूतापीय ऊर्जा आधारित हीटिंग तथा तत्तापानी (छत्तीसगढ़) एवं सुरजकुंड (झारखंड) में भू-तापीय पर्यटन की संभावनाएँ स्थानीय विकास को प्रोत्साहित कर सकती हैं।
भूतापीय
ऊर्जा भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा समावेशी विकास, हरित अर्थव्यवस्था
और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति का महत्वपूर्ण
साधन है। वैज्ञानिक निवेश और नीति समर्थन के माध्यम से यह विकसित भारत 2047 की
यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
e) Describe the initiatives taken by government to enhance inclusive and sustainable development of South Bihar in last 10 years. [7] पिछले 10 वर्षों में दक्षिण बिहार के समावेशी और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
दक्षिण बिहार (गया,
नवादा, औरंगाबाद, जमुई,
बांका, रोहतास आदि) सूखा-प्रवण, नक्सल-प्रभावित एवं अपेक्षाकृत पिछड़ा क्षेत्र रहा है। पिछले दशक में
सरकार ने क्षेत्रीय असमानता कम करने तथा समावेशी एवं सतत विकास को लक्ष्य बनाकर
अनेक पहलें की हैं।
प्रमुख कदम:
अवसंरचना
सुदृढ़ीकरण-
सड़क, पुल, रेलवे
विस्तार, विद्युतीकरण तथा नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में
विशेष सड़क एवं संचार परियोजनाओं से दुर्गम क्षेत्रों की बाजार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ी और क्षेत्रीय एकीकरण को बल
मिला।
जल
एवं कृषि प्रबंधन-
जल-जीवन-हरियाली अभियान, सोन नहर प्रणाली का
आधुनिकीकरण, आहर-पईन पुनर्जीवन तथा सौर सिंचाई पंपों ने जल
संरक्षण, सूखा-प्रबंधन एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को
प्रोत्साहित कर सतत विकास की आधारशिला मजबूत की।
रोजगार
एवं स्थानीय अर्थव्यवस्था-
औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन, कौशल विकास मिशन,
खाद्य प्रसंस्करण तथा स्थानीय उद्योगों के विस्तार से रोजगार एवं आय
के अवसर बढ़े तथा प्रवासन पर अंकुश लगाने का प्रयास हुआ।
सामाजिक
समावेशन-
जीविका स्वयं सहायता समूह, कन्या उत्थान,
छात्रवृत्ति तथा अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण योजनाओं ने महिलाओं
एवं वंचित वर्गों की आर्थिक एवं सामाजिक भागीदारी सुदृढ़ की।
मानव
विकास-
आकांक्षी जिला कार्यक्रम, हर घर नल-जल,
स्वास्थ्य, शिक्षा एवं डिजिटल सेवाओं के
विस्तार से मानव विकास सूचकांकों तथा सेवा-प्रदायगी में सुधार हुआ।
इन
पहलों ने दक्षिण बिहार में अवसंरचना विकास को सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय
संरक्षण और स्थानीय आजीविका से जोड़ते हुए संतुलित क्षेत्रीय विकास की दिशा को
मजबूत किया है। भविष्य में सिंचाई, औद्योगीकरण एवं
कौशल-आधारित निवेश को गति देकर इसे SDGs-अनुरूप समावेशी
विकास मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।